काशी के लोकोत्सव: सोरहिया मेले के विशेष सन्दर्भ में
सुधीर कुमार राय
असिस्टेण्ट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, उदयप्रताप स्वायत्तशासी काॅलेज, वाराणसी।
काशी बहुसंस्कृति-समन्वय केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ विविध धर्मावलम्बी सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहते हैं। इसकी गंगा-जमुनी संस्कृति का अलग रंग है। प्राचीन काल से ही काशी ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बियों के तीर्थ के रूप में विख्यात है। इसे समाजशास्त्रीय शब्दावली में पवित्र-सम्मिश्र ;ैंबतमक ब्वउचसमगद्ध के रूप में जाना जाता है। इसकी प्राचीनता, निरंतरता एवं मोहकता विश्वजनिन है। लगभग तीन सहस्राब्दियों से यह अपनी पवित्रता बनाये हुए है। धर्मशास्त्रों में इसे कई नामों से जाना जाता है-वाराणसी, काशी, आनन्दकानन, अविमुक्त एवं महाश्मशान1। हिन्दुओं के लिए यह नगर अटूट धार्मिक पवित्रता,पुण्य तथा विद्या का प्रतीक रहा है। अपनी महान जटिलताओं तथा विरोधों के कारण यह सभी युगों में भारतीय जीवन का एक सूक्ष्म स्वरूप रहता आया है। काशी के विषय में बौद्ध-जैन ग्रन्थों, महाकाव्यों, पुराणों एवं लौकिक साहित्य में अनेक बाते लिखी गयी हैं। किन्तु इसके सम्बन्ध में मौखिक परम्परा भी काफी समृद्ध है।
भारतीय परम्परा के मुख्यतः दो अक्षय स्रोत हैं -आगम एवं निगम।2 जिन्हें क्रमशः लोक ;थ्वसाद्ध तथा शास्त्र ;ज्मगजद्ध के रूप में जाना जाता है। शास्त्र तथा लोक का अन्तर्सम्बन्ध वस्तुतः इतिहास-समाजशास्त्र सम्बन्ध है। इन दोनों दृष्टियों के लिए ज्मगज तथा ब्वदजमगज की आवश्यकता पड़ती है। इतिहास में जहां ज्मगज का महत्त्व है, वहीं समाजशास्त्रीय प्रमाणीकरण के लिए ज्मगज से अधिक महत्त्व ब्वदजमगज का होता है।
विश्व के प्राचीनतम जीवित नगरांे में काशी एक है। इसकी जीवंतता को बनाये रखने में यहां के लोकोत्सवों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यहां के विषय में कहावत है- ‘सात वार नौ त्योहार’। यानी सप्ताह के सात दिन में नौ त्योहार का पड़ना। इन त्योहारों तथा पर्वों का सम्बन्ध यक्ष पूजा, वृक्ष पूजा, देवी पूजा, कूप और नदी पूजा तथा पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा के रूप में पाते हैं। दीपावली का उल्ल्ेख तो जातकों तक में वर्णित है। यहां कुछ प्रमुख मेलों एवं त्योहारों का उल्लेख किया जा रहा है।3
1ण् नवरात्र मेला- यह मेला चैत्र शुक्ल में नौ दिनों तक दुर्गाकुण्ड में लगता है।
2ण् गनगौर- चैत्रशुक्ल की तृतीया को यह मेला राजमन्दिर में लगता है तथा मारवाड़ी गनगौर की सवारी निकालते हैं।
3ण् रामनवमी- चैत्र शुक्ल नवमीं को रामधाट पर लगता है।
4ण् गंगा सप्तमी- वैशाख शुक्ल सप्तमी को गंगा नदी के जन्म के उपलब्ध में लगता है। पंचगंगा घाट का शहनाई दंगल भी उल्लेखनीय है।
5ण् नरसिंह चैदस- बड़े गणेश पर वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को होता हे।
6ण् गाजी मिर्जा का मेला- ज्येष्ठ के पहले रविवार को बकरिया कुण्ड पर यह मेला लगता है।
7ण् गंगादशहरा- ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दशहरा मेला लगता है।
8ण् निर्जला एकादशी- ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी को लगता है।
9ण् स्नान यात्रा- अस्सी पर ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को जगन्नाथ की प्रतिमा का स्नान होता है।
10ण् रथयात्रा- बेनीराम पंडित के बाग में आषाण शुक्ल द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी को मेला लगता है। जगन्नाथ का रथ अस्सी से खींचकर लाया जाता है।
11ण् पट परीक्षा- आषाढ़ शुक्ल की पूणिमा को चैकाघाट में पट परीक्षा का मेला लगता हे। पहले इस दिन ज्योतिषी घाट के किनारे हवा के रूप के आधार पर भविष्यवाणी करते थे।
12ण् शंखूधारा- पर्व के दिन उक्त तालाब में लोग स्नान करते हैं।
13ण् वृद्धकाल मेला- श्रावण के हर रविवार को होता है। इसमें लोग स्वास्थ्य-लाभ के लिए वह वृद्ध काल के कुएं के पानी से स्नान करते हैं।
14ण् दुर्गा जी का मेला- श्रावण के हर मंगलवार को दुर्गाजी का मेला लगता है
15ण् फातमान का मेला- श्रावण के हर वृहस्पतिवार को मेला लगता है। (दुर्गाजी तथा फातमान मेले में पहले बनारस की वारवनिताएं खूब सज धज कर भाग लेती थीं)
16ण् नागपंचमी- श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागकुआं पर मेला लगता है
17ण् कजरी तीज- भाद्र मास की कृष्ण तीज को शंखूधारा तथा इसरगंगी पर यह मेला लगता है।
18ण् ढेला चैथ- भाद्र मास की शुक्ल चैथ को यह मेला लगता है। इस पर गणेश पूजन होता है।
19ण् लोलारक छठ- अस्सी के समीप लोलार्क कुण्ड पर यह मेला भाद्र शुक्ल षष्ठी को लगता है।
20ण् वामन द्वादसी- भाद्र शुक्ल द्वादसी को मेला चित्रकूट और वरना संगम पर लगता है।
21ण् अनंत चैदस- भाद्र शुक्ल चतुर्दशी को गंगा स्नान के बाद अनंत की पूजा होती है तथा इसी दिन रामनगर की रामलीला प्रारम्भ होती है।
22ण् रामलीला- क्वार कृष्ण पक्ष द्वितीया से लेकर अमावस्या तक काशी में अनेक रामलीलाएं होती हैं । दशमी को चैकाघाट पर विजयदशमी का मेला लगता है।
23ण् दुर्गा मेला- क्वार शुक्ल पक्ष प्रथमा से तृतीया तक बंगाली दुर्गाजी की मूूर्तियों की पूजा करते हैं और मूर्तियों को गंगा में विसर्जित कर देते हैं।
24ण् धनतेरस- कार्तिक कृष्णपक्ष को त्रयोदशी को मेला लगता है।
25ण् नरक चैदस- भदैनी और मीरघाट में धनतेरस के दूसरे दिन हनुमान की जन्मतिथि पर मेला लगता है।
26ण् दीवाली- कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीवाली का मेला लगता है।
27ण् यम द्वितीया- कार्तिक शुक्ल द्वितीया को जमघाट पर मेला लगता है । बहने भाईयों को टीका लगाती हैं और भाई बहनों के यहां भोजन करते हैं।
28ण् कार्तिकी पूर्णिमा - इसका बनारस में बड़ा महत्व है।
29ण् वरना पर पियाले का मेला- यह मेला अगहन के पहले मंगल या शनिवार को लगता हे।
30ण् पंचक्रोशी मेला- अगहन कृष्ण सप्तमी, अष्टमी को शिवपुर में मेला लगता है।
31ण् लोटा भंटा मेला- यह मेला अगहन शुक्लपक्ष चतुर्दशी को पिशाचमोचन पर लगता है।
32ण् नगर-प्रदक्षिणा - यह मेला अगहन शुक्ल पूर्णिमा को लगता है। इसमें दो दिन में नगर प्रदक्षिणा होती है। पहला पड़ाव चैकाघाट होता है वहां कृष्ण लीला भी होती है।
33ण् गणेश चैथ- माघकृष्ण चतुर्थी को बड़े गणेश पर भारी मेला लगता है।
34ण् वेदव्यास- माघ के हर सोमवार को रामनगर किले में मेला लगता है।
35ण् महाशिवरा़ित्र- फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को लगता है । यह खास मेलों में एक है । मुख्य मेला विश्वनाथ पर लगता है।
36ण् होली- यह त्योहार फाल्गुन शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक लगता है।
37ण् बुढ़वा मंगल - होली के दूसरे मंगल को यह मेला लगता है।
इस प्रकार उपर्युक्त सूची के आधार पर बनारस के कुछ प्रमुख मेलों-पर्वों तथा उत्सवों का उल्लेख हुआ है। यद्यपि इन वर्णित पर्वों में सारे पर्व सम्मिलित नहीं है। अभी बहुत सारे पर्व-त्योहार और भी हैंै। क्रमश 1 से 36 तक दिये गये सूची में हिन्दू संवत्सर के अनुसार पहले महीने चैत्र मास से प्रारम्भ होकर बारहवें व अन्तिम महीनें फाल्गुन के हैं। मात्र 37वां बुढ़वा मंगल तिथिबद्ध होने के कारण चैत्रमास में प्रवेश करता है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं मेरा अध्ययन विषय सोरहिया मेला है, इस कारण इसे बीच के क्रम से हटाकर क्रमभंग किया है, अन्यथा यह 21वें स्थान पर वामन द्वादशी और अनंत चैदस के बीच होता ।
शीर्षक में लोकोत्सव अवधारणा का प्रयोग है। यहां मैं पर्व -उत्सव तथा त्योहार में कुछ सूक्ष्म भेद करने का प्रयास कर रहा हूँ। मेरी दृष्टि में त्योहार का सम्बन्ध कदाचित धर्म, कर्मकाण्ड तथा अनुष्ठान से है । यह सामाजिक होते हुए व्यक्तिगत भी हो सकता है, किन्तु उत्सव का सम्बन्ध सर्वथा धार्मिक एवं कर्मकाण्डीय हो, ऐसा आवश्यक प्रतीत नहीं होता है, किन्तु यह सर्वथा सामाजिक प्रकृति का ही होगा। अतएव त्योहार-उत्सव हो सकता है, किन्तु हर उत्सव त्योहार नहीं हो सकता है।
1. महालक्ष्मी के मन्दिर का मुख्य द्वार का शिलापट्ट
2. लक्ष्मी कुण्ड का प्रवेश द्वार
3. लक्ष्मीकुण्ड
4. पूजा सामग्री की दुकानें
5. पूजा सामग्री बेचता दुकानदार
6. बिक्री हेतु मिट्टी की महालक्ष्मी की मूर्तियां
7. जिउतिया खरीदतीं महिलाएँ
8. महालक्ष्मी मूर्तियों के विविध प्रकार (अ)
9. महालक्ष्मी मूर्तियों के विविध प्रकार (ब)
10. मखाने एवं पुष्प की माला
11. सोलह पुष्पों एवं जिउतिया धारण किए महिला
12. परिक्रमा (फेरी) करते नर-नारी
13.कुण्ड में मरी मछलियां
14. प्रदूषण रोकने हेतु प्रशासन की चेतावनी
15.कुण्ड में पूजा सामग्री विसर्जित करतीं महिला।
16. मूर्तियों की कार्यशा ला (अ )
17. मूर्तियों की कार्यशा ला (अ )
समाज की निरन्तरता एवं गतिशीलता हेतु लोक तथा शास्त्र की अन्तक्र्रिया आवश्यक है। यह लघु तथा बृहद परम्परा4 के रूप में सार्वभौमीकरण5 तथा स्थानीयकरण6 की प्रक्रियाओं का अन्तः सम्बन्ध है और यही अंतःसम्बन्ध समाज को जीवन तथा गति प्रदान करता है। इसी सामाजिक जीवंतता तथा गति के प्रवाह के क्रम में मैंने अपने शोध पत्र में काशी के लोकात्सवों में से वैयक्तिक अध्ययन ;ब्ंेम ेजनकलद्ध के रूप में सोरहिया मेले का समाजशास्त्रीय अध्ययन पद्धति के अन्तर्गत क्षेत्रकार्य ;थ्पमसक ॅवताद्ध द्वारा अवलोकन किया है, जिसका विश्लेषण प्रस्तुत है-सोरहिया मेला भाद्र शुक्ल पक्ष अष्टमी से प्रारम्भ होकर क्वार कृष्ण पक्ष अष्टमी तक अर्थात 16 दिन चलता है। यह मेला लक्ष्मीकुण्ड पर लगता है। वाराणसी में लक्ष्मीकुण्ड नामक मुहल्ला है जहां इस कुण्ड सहित अनेक देवस्थान स्थित हैं। यहां सबसे प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर जो मकान नं0 डी0 52/40 में स्थित है।7 वस्तुतः मेरे स्वयं के क्षेत्रकार्य के अनुसार यह मकान नं0 54/40 में है। (चित्रसंख्या-1)यहां स्थित कुण्ड का प्राचीन नाम महालक्ष्मी कुण्ड (चित्रसंख्या-3) था, परन्तु अब इसको लक्ष्मीकुण्ड कहते हैं। एक अन्य कुण्ड जिसका नाम श्रीकुण्ड था मत्स्योदरी क्षेत्र में था, जो अब लुप्त हो गया है और उसके साथ ही साथ उससे सम्बन्धित देवस्थान भी नष्ट हो गये हैं। परन्तु वहां की श्री देवी तथा महालक्ष्मीश्वर यहां पुनः स्थापित हुए और वहां के श्री कण्ठ नामक शिवलिंग की पुनः स्थापना भी वर्तमान लक्ष्मीकुण्ड पर हुई। महालक्ष्मी मन्दिर के उत्तर में हयकण्ठी देवी और दक्षिण में कौर्मीशक्ति तथा वायव्यकोण में शिखिचण्डी के स्थान थे। हयकण्ठी कालीमठ में खिन्नी के पेड़ के नीचे हैं। (मकान नं0 डी 52/35) , शिखिचण्डी लक्ष्मीजी के वर्तमान मन्दिर में दक्षिणाभिमुखी है। कूणिनाक्षविनायक आदिलक्ष्मी के मन्दिर में है। लक्ष्मीकुण्ड से सम्बद्ध लक्ष्मीश्वर-सोरहियानाथ नाम से पूजे जाते हैं। (मकान नं0 डी 52/54) । श्रीकण्ठ लिंग तथा मण्डविनायक मकान नं0 डी 53/38 में है।
सामान्य दिनों में भी इस स्थल पर चहल-पहल रहती है। नगर का प्राचीन क्षेत्र के रूप में सम्प्रति यह लक्सा के समीप स्थित है। आसपास मिट्टी की मूर्तियों को बनाने वालों की कार्यशालायें हैं। (चित्रसंख्या -15 अ, ब) मेले के अवसर पर यह क्षेत्र अत्यधिक भीड़-भाड़ वाला हो जाता है। पूरा क्षेत्र मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं (चित्र संख्या-6, 8,9), शृंगार सामग्री, पूजा सामग्री (चित्र संख्या-4), प्रसाद और मेवे आदि की दुकानों से सज जाते हैं।(चित्रसंख्या-5,10), मान्यता है कि भाद्रपद पक्ष की शुक्ल अष्टमी से सोलह दिन तक लक्ष्मीकुण्ड में स्नान कर महालक्ष्मी मन्दिर की सोलह फेरी (परिक्रमा) (चित्र संख्या-11,12), लेने से सौभाग्य, समृद्धि की वृद्धि होती है तथा सन्तान की प्राप्ति एवं प्रगति भी होती है। प्रत्येक फेरी (परिक्रमा) में देवी को एक नैवेद्य प्रदान किया जाता है जैसे सोलह पुष्प के साथ फेरी की जाती है और प्रत्येक फेरी में एक पुष्प चढ़ाया जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक दिन सोलह पृथक-पृथक वस्तुओं के साथ यह पूजा की जाती है। महालक्ष्मी की मिट्टी की मूर्ति खरीदकर मन्दिर में चढ़ाकर उसे वर्षभर घर ले जाकर पूजा की जाती है तथा अगले वर्ष उस मूर्ति को कुण्ड में विसर्जित कर नई मूर्ति खरीदी जाती है। कुछ महिलायें सोलह दिनों तक अन्न ग्रहण नहीं करती हैं तथा फलाहार व्रत धारण करती हैं। पास ही स्थित काली मन्दिर में संध्या के साथ एकत्र होकर पचरा गाया जाता है । पचरा देवी गीत का एक रूप है। मेले का समापन जीवित्पुत्रिका नामक व्रत के साथ होता है। चंूकि जीवित्पुत्रिका पूर्वांचल का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण व्रत है जिसे पुत्रवती महिलाओं द्वारा पुत्र के कल्याणार्थ किया जाता है। अतः इस अवसर पर यहां अत्यधिक भीड़ होती है। महिलायें यहां स्नान एवं पूजार्थ एकत्र होती हैं । मेले में दुकानों से पवित्र धागे की माला खरीदकर उसमें स्वर्ण एवं चांदी की बनी जीउतिया पहनकर (चित्र संख्या -10) महिलायें गोठ लगती हैं तथा जीवत्पुत्रिकाष्टमी की कथायें सुनती हैं। शास्त्रानुसार इस दिन शालिवाहन राजा के पुत्र जीमूतवाहन की पूजा होती है।8 किन्तु महिलाओं द्वारा जीउतिया माई अर्थातदेवी की पूजा होती है।
मेले के इस विवरण की कुछ समीक्षा आवश्यक है। सर्वप्रथम इसमें शास्त्र एवं लोक का मिश्रण दिखाई देता है। मेला मुख्यतः: सोरहियानाथ जिसे शिव का रूप माना जाता है, के लिए लगता है किन्तु मेले में पूजा मुख्यतः महालक्ष्मी देवी की होती है। चूंकि मेला सोलह दिन चलता है अतः ऐसा लगता है कि इस मेले में इस संख्या का मानवी- करण देवता के रूप में किया गया है। लक्ष्मी लोक एवं शास्त्र दोनों में वर्णित है। लक्ष्मी, श्री लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, वैभवलक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी, राज्यलक्ष्मी, विजयश्री, कैवल्य लक्ष्मी आदि विविध रूपों में लक्ष्मी उपासना का प्रचलन भारत में अत्यन्त प्राचीनकाल से है। इन विविध रूपों में देवी की आराधना वैभव, ऐश्वर्य और समृद्धि हेतु होती है, इसी कारण लक्ष्मी किसी धर्म विशेष की देवी नहीं थी। बौद्ध, जैन एवं ब्राह्मण तीनों परम्पराओं में लक्ष्मी की समान मान्यता है। भरहुत और सांची के बौद्ध स्तूप, उड़ीसा की खण्डगिरी की जैन गुफाओं तथा मथुरा की अनेक कलाकृतियां लक्ष्मी की मूर्तियों से अलंकृत है।9 शंुगकालीन अर्थात द्वितीय -प्रथम शताब्दी ईसापूर्व लक्ष्मी के इन स्वरूपों का उदाहरण प्राप्त होता है। ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में उनमें और भी रूप मिलने लगते हैं जो लोक में लक्ष्मी उपासना की लोकप्रियता का सूचक है। गुप्तकाल में लक्ष्मी वैष्णव देवमण्डल में जुड़ जाती है तथा विष्णु की पत्नी के रूप में उनकी उपासना होने लगती है।10 विष्णु के विविध मूर्तियों में शेषशायी11 लक्ष्मी नरसिंह12 आदि में उनका अंकन होने लगता है। किन्तु लक्ष्मी का लोक स्वरूप अक्षुण बना रहा तथा कुषाणकाल में बनने वाली कुबेर लक्ष्मी के स्थान पर कालान्तर में दीपावली पर लक्ष्मी और गणेश के रूप में पूजित होने लगी। लक्ष्मी-गणेश की संयुक्त मूर्तियों का मिलना उत्तरकालीन है13 यद्यपि गणेश शैव परिवार के देवता हैं। किन्तु उनकी प्रारम्भिक उपासना विनायक के रूप में होती थी तथा कला .में गणेश का अंकन यक्ष मूर्तियों के काफी समान लगता है। लक्ष्मी की महत्ता के कारण ही विविध वृहद परम्पराओं द्वारा लक्ष्मी को स्वयं में आत्मसात करने का प्रयास किया गया चाहे वह बौद्ध हो, जैन हो या शैव तथा वैष्णव ।
एक समाजशास्त्री के रूप में मैं व्याख्या करूं तो सोरहिया मेले की लक्ष्मी पूजा लोक की लक्ष्मी पूजा है जो शास्त्र से स्वतंत्र है। आज भी लोक की कला अर्थात मिट्टी की मूर्तियों में लक्ष्मी की पूजा होती है। विविध अनुष्ठान भी लोक की मान्यताओं के अनुसार हैं। सोरहिया मेला काशी का विशिष्ट मेला है और इसका आयोजन केवल यहीं पर होता है। यह मेला अनेक कुम्हारों की जीविका का साधन है। विविध अन्य छोटे उद्योग भी इस पर आश्रित हैं। यह लोगों की आस्था एवं विश्वास का मुख्य केन्द्र है, किन्तु आश्चर्य की बात है कि इस ऐतिहासिक मेले के सांस्कृतिक स्वरूप की अब काशी में उतनी चर्चा नहीं होती जितनी इसके पर्यावरणीय संदर्भों की । कारण है मेला का मुख्य स्थल लक्ष्मीकुण्ड भी काशी के अन्य जलतीर्थों के समान अत्यन्त प्रदूषित हो चुका है । प्रतिवर्ष भाद्र माह में मेला लगते ही इस कुण्ड में टनों मछलियां मरने लगती हैं । (चित्र संख्या-13) प्रशासन का मानना है कि इसका कारण है- कुण्ड में लक्ष्मी की मूर्तियों का तथा पूजा सामाग्री का विसर्जन । मूर्तियों पर रंग के रूप में लगा रसायन कुण्ड में जल को प्रदूषित करता है तथा मछलियांे के मरने एवं सड़ने से पूरा क्षेत्र दुर्गन्ध से भर उठता है। मैंने अपने क्षेत्रकार्य के समय कुण्ड में असंख्य मरी मछलियों को उतराते देखा । प्रशासन सफाई कार्य में संलग्न था तथा जनता को जागरूक करने हेतु कुण्ड को प्रदूषित न करने का आह्वान करने वाला बैनर लगा रखा था। (चित्र संख्या-2,14) आसपास के लोगों से बात करने पर पता चला कि पिछले कई वर्षों से मेलों के समय ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है । एक व्यक्ति ने बताया कि कुण्ड का सम्बन्ध पहले गंगा नदी से था तथा पानी की गतिशीलता बनी रहती थी किन्तु जबसे गंगा से सम्पर्क मार्ग को बंद कर दिया गया है, कुण्ड प्रदूषित हो गया है और मेले में आने वाले लोगों द्वारा विसर्जित सामग्रियां इसे और प्रदूषित कर देती हैं।
बदलते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में आज हमारी अनेक परम्पराएं परिवर्तित होती जा रही हैं, आवश्यकता है, उनके संरक्षण की तथा ये मेले तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं इन्हें बचाना अत्यन्त आवश्यक है और यह तभी संभव है, जब हम उन केन्द्रों को सुरक्षित रखें जहां इनका आयोजन होता है। अर्थात जब लक्ष्मीकुण्ड का अस्तित्व रहेगा तभी सोरहिया मेला होगा।
संदर्भ-
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12. पूर्वोक्त, पृ 417
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Received on 02.12.2014 Modified on 16.12.2014
Accepted on 28.12.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 2(4): Oct. - Dec., 2014; Page 217-223